नई दिल्ली:
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर के हालात से वहां के कलाकार भी दुखी हैं। राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव में अपनी प्रस्तुति देने आए वहां के कलाकार कश्मीर के हालात के लिए बेरोजगारी और अशिक्षा को जिम्मेदार मानते हैं। राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव में अपनी 15 सदस्यीय कलाकारों की टोली के साथ श्रीनगर से आए गुलजार अहमद बट का कहना है कि कश्मीर का युवा अपने हाथ में पत्थर नहीं रोजगार चाहता है। वह शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति को समझना चाहता है। कश्मीर के युवाओं को उनकी संस्कृति बताने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, पहले पूरा कश्मीर ¨हदू आबादी वाला था फिर वहां पर लोगों का धर्मातरण हुआ, लेकिन लोगों ने इस धरती से प्रेम के कारण कभी अपना उपनाम नहीं बदला। मैं आज भी अपने नाम के अंत में बट लगाता हूं। कश्मीर के युवाओं को कन्या कुमारी के बारे में बताना चाहिए कि यह देश अपने में कितनी विविधता समेटे हुए है। सांस्कृतिक रूप से कितना संपन्न है और इस देश की मूल भावना में ही शांति है। कश्मीर को देश के अन्य हिस्सों के लोग नहीं जानते, यही हाल कश्मीर के लोगों का है। कश्मीर में लोगों को आना चाहिए और वहां के लोगों को बाहर जाना चाहिए। कश्मीरी लोगों के पास काफी प्रतिभा है उसका सही तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लोक कलाओं के बारे में उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ कश्मीर में भी लोगों ने लोक कलाओं के माध्यम से आजादी का बिगुल फूंका, लेकिन आज वहां लोक कलाएं हाशिए पर हैं। राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव में कश्मीरी लोक नृत्य रूफ प्रस्तुत करने आए कलाकार दिल्ली में प्रस्तुति देने से काफी खुश हैं। गुलजार अहमद बट बताते हैं कि यह नृत्य रमजान के माह में इफ्तार के बाद की नमाज के बीच जो एक घंटे का वक्त होता है उस दौरान होता था, अब धीरे-धीरे यह कम होता जा रहा है। इस टोली की सदस्य इफरा खान बताती हैं कि देश में और देश के बाहर हम जहां प्रस्तुति देने जाते हैं हमें लोगों का भरपूर प्यार मिलता है। लोक नृत्य रूफ के बारे में वह बताती हैं कि कश्मीर में यह रमजान, दीपावली और बैसाखी में प्रस्तुत किया जाता है। यह पारंपरिक लोक नृत्य है।

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