भारत का मुस्लिम मानस मौन है। आप गौर करें बिरला ही कोई मुसलमान होगा जो ट्विटर, फेसबुक याकि सोशल मीडिया पर अपनी बात कह रहा है। मुस्लिम मानस का यह मौन कई अर्थ लिए हुए है। मुझे इस मौन के बीच अपने एक पाठक का सवाल सुनना अच्छा लगा। इजराइल पर लिखे मेरे लेख पर उसके पूछे का भावार्थ था, तो क्या आप भारत में भी मुसलमानों की ठुकाई चाहते हैं?
कतई नहीं! इसलिए कि भारत में रह रहा मुसलमान भारत का उतना ही अधिकारपूर्ण, इज्जतदार, मानवाधिकारों का हक लिए नागरिक है जितना हिंदू हैं। इस सिलसिले में पिछले सप्ताह नया इंडिया में छपे शंकर शरण का ‘मुस्लिम अपने, इस्लाम नहीं’ लेख हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए, जिसे भारत की, राष्ट्र-राज्य की, कौम की और अपने अस्तित्व की चिंता है। मैं उसी चिंता में यह जरूरी मानता हूं कि देश वही सुरक्षित है, जिसकी दुश्मन को लेकर नीति, व्यवहार बना हुआ है। पाकिस्तान की नीति इस्लाम है। इस्लाम का जिहाद है। उसके लिए उसने जितनी तरह के उपाय थे पिछले 70 सालों में किए। वह आगे भी करेगा। उस नाते हमारे लिए जरूरी है कि हम देखें कि दुनिया के बाकी देशों ने 70 साल में अपने को कैसे सुरक्षित बनाया? कैसे अपनी कौम, अपनी मातृभूमि का गौरव बढ़ाया?
मेरे हिसाब से भारत के दुश्मन, उसकी समस्या और उसकी रीति-नीति में इजराइल की प्रासंगिकता सर्वाधिक है। इजराइल के तौर-तरीके अपना कर, पाकिस्तान को ठोक कर या जम्मू-कश्मीर में अपनी जोर-जबरदस्ती समस्या सुलटाना भारत के मुसलमानों के भी हित में है। इसलिए कि दिल पर हाथ रख कर भारत का जब भी कोई मुसलमान विचार करेगा तो वह मानेगा कि यदि पाकिस्तान नहीं बना होता तो भारत के मुसलमानों को ये दिन नहीं देखने पड़ते।
हां, भारत के मुसलमानों के लिए भी पाकिस्तान उस शैतान का नाम है, जिसने हिंदू-मुसलमान के सहअस्तित्व में कांटे बोए। भारत का मुसलमान जानता है और जानना चाहिए कि कांटे गांधी, नेहरू, सरदार पटेल ने नहीं बोए, जिन्ना और उनके पाकिस्तान ने बोए। पाकिस्तान है, जिसने गांधी, नेहरू की सेकुलर घोषणा, मौलाना आजाद को सिर पर बैठाने के बावजूद पहले ही दिन इस बात पर लड़ाई छिड़वा दी कि राजा हरि सिंह ने अपनी रियासत भले भारत में मिला दी मगर मुस्लिम श्रीनगर और घाटी में क्योंकि बहुसंख्या में हैं इसलिए उसे भारत राष्ट्र-राज्य अपने में नहीं रख सकता।
मतलब पाकिस्तान की दुश्मनी जन्मजात है। उसका यह घोषित सिद्धांत है कि हिंदुओं पर हमने राज किया। लाल किला पर हमें झंडा फहराना है। हिंदुस्तान को निजाम ए मुस्तफा बनाना है भले इसके लिए हजार साल लड़ना पड़े। पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो हों या जिया उर रहमान या परवेज मुशर्रफ या हाफिज सईद और मसूद अजहर सबने घोषित तौर पर यदि भारत को बरबाद करने, तोड़ने की सार्वजनिक कसमें खाई हैं। आतंकी संगठनों और जिहादियों की मदरसों में फौज बनवाई है तो क्या भारत को यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे फिर इस दुश्मन से वैसे ही निपटना चाहिए जैसे इजराइल ने अपने दुश्मनों को निपटाया?
और भारत का ऐसा करना क्या भारत के मुसलमानों के लिए ठीक नहीं होगा? जम्मू-कश्मीर में यदि अलगावादी पत्थर फेंक कर भारत राष्ट्र-राज्य को झुकाने की फिराक में है तो उन्हें ठोकना, उनके प्रति सख्ती से पेश आना क्या भारत के मुसलमानों के हित में नहीं होगा? अब तो मुसलमानों के लिए यह इसलिए भी जरूरी है कि इस्लामी स्टेट, इराक, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक में भी जो हुआ है या जो हो रहा है वैसी स्थितियां यदि पाक या इस्लामी स्टेट का झंडा उठाए इस्लामी चरमपंथी कश्मीर घाटी में बनवा देना चाहते है तो क्या दिल्ली का मुसलमान या यूपी, केरल के मुसलमान के लिए खौफनाक नहीं होगा?
सो, भारत की नीति का मतलब यहां के हिंदू, मुसलमान दोनों के साझा दुश्मन के प्रति नीति है। आज मन ही मन सलमान खान, आमिर खान या शाहरुख खान भी सोचते होंगे कि पाकिस्तान, इस्लामी चरमपंथियों के बवाल ने कैसे उनका जीना हराम किया हुआ है। शाहरुख खान ने अमेरिका के एयरपोर्ट पर बेइज्जत होकर ‘माई नेम इज खान’ फिल्म बना कर दुनिया को बताना चाहा कि मैं तो सच्चा मुसलमान हूं, अमनपरस्त हूं मगर उसे फिर भी अमेरिकी एयरपोर्ट में बेखटके एंट्री नहीं मिली या भारत में विवादों में फंसा रहना होता है तो पाकिस्तान, हाफिज सईद, गिलानी, बगदादी जैसे दुश्मनों के ही कारण।
संदेह नहीं कि भारत का मुसलमान छाती फाड़ कर अपनी देशभक्ति दिखाने की चिंता में घुटा रहता है तो इसकी वजह क्या हिंदू हैं? क्या नरेंद्र मोदी या अमित शाह हैं या पहले मनमोहन सिंह या नेहरू, गांधी वजह थे?
नहीं, पूरी दुनिया में आज मुसलमान के लिए छाती फाड़ कर अपने को अमनपरस्त बताना अनिवार्य हुआ पड़ा है तो वजह इस्लाम के विचार से पैदा वे दुश्मन हैं जो ईसाई के भी दुश्मन हैं तो यहूदी और हिंदू के भी हैं और खुद मुसलमान के लिए भी हैं।
बहरहाल, मैं भटक रहा हूं, फलसफाई हो रहा हूं। पते की बात यह कि भारत को इजराइल जैसा बनाना मुसलमान के लिए खतरा नहीं है। भारत यदि पाकिस्तान को ठोकता है तो इसमें भारत के 15-20 करोड़ मुसलमानों को फिक्र नहीं करनी चाहिए। उसी में उनकी सुरक्षा है। हां, सचमुच पाकिस्तान और उसके आतंकियों की बरबादी भारत के मुसलमानों की खुशहाली है।
अपना मानना है कि पिछले 70 साल भारत राष्ट्र-राज्य सख्त नहीं था, इजराइल जैसी रीति-नीति से ताकत को सलामी की राष्ट्रनीति नहीं बनी तो उसी के कारण भारत का मुसलमान भी भटका रहा है। पाकिस्तान और उसके इस्लामी चरमपंथियों की कट्टरता ने भारत के मुसलमानों को गुमराह किया। कईयों ने पाकिस्तान को स्वर्ग, इस्लामी महाशक्ति का पर्याय बूझा। एक फेल, मवाली, गुंडे देश की गुमराही में जम्मू-कश्मीर के लोग भटके तो भारत में भी कई भटके।
इसलिए जनाब ए आली, भारत और उसका हिंदू यदि कौम की चिंता में, भारत माता, भारत भूमि की चिंता में अपने को इजराइल बनाने जैसा सोचता है तो उसमें भारत के मुसलमानों की खुशहाली भी है और सुरक्षा भी। आप अल्हा ताला से गुजारिश करें कि हिंदू सदियों के डर से बाहर निकल साहसी, निडर बने?
क्या करेंगे ऐसी इबादत?
कतई नहीं! इसलिए कि भारत में रह रहा मुसलमान भारत का उतना ही अधिकारपूर्ण, इज्जतदार, मानवाधिकारों का हक लिए नागरिक है जितना हिंदू हैं। इस सिलसिले में पिछले सप्ताह नया इंडिया में छपे शंकर शरण का ‘मुस्लिम अपने, इस्लाम नहीं’ लेख हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए, जिसे भारत की, राष्ट्र-राज्य की, कौम की और अपने अस्तित्व की चिंता है। मैं उसी चिंता में यह जरूरी मानता हूं कि देश वही सुरक्षित है, जिसकी दुश्मन को लेकर नीति, व्यवहार बना हुआ है। पाकिस्तान की नीति इस्लाम है। इस्लाम का जिहाद है। उसके लिए उसने जितनी तरह के उपाय थे पिछले 70 सालों में किए। वह आगे भी करेगा। उस नाते हमारे लिए जरूरी है कि हम देखें कि दुनिया के बाकी देशों ने 70 साल में अपने को कैसे सुरक्षित बनाया? कैसे अपनी कौम, अपनी मातृभूमि का गौरव बढ़ाया?
मेरे हिसाब से भारत के दुश्मन, उसकी समस्या और उसकी रीति-नीति में इजराइल की प्रासंगिकता सर्वाधिक है। इजराइल के तौर-तरीके अपना कर, पाकिस्तान को ठोक कर या जम्मू-कश्मीर में अपनी जोर-जबरदस्ती समस्या सुलटाना भारत के मुसलमानों के भी हित में है। इसलिए कि दिल पर हाथ रख कर भारत का जब भी कोई मुसलमान विचार करेगा तो वह मानेगा कि यदि पाकिस्तान नहीं बना होता तो भारत के मुसलमानों को ये दिन नहीं देखने पड़ते।
हां, भारत के मुसलमानों के लिए भी पाकिस्तान उस शैतान का नाम है, जिसने हिंदू-मुसलमान के सहअस्तित्व में कांटे बोए। भारत का मुसलमान जानता है और जानना चाहिए कि कांटे गांधी, नेहरू, सरदार पटेल ने नहीं बोए, जिन्ना और उनके पाकिस्तान ने बोए। पाकिस्तान है, जिसने गांधी, नेहरू की सेकुलर घोषणा, मौलाना आजाद को सिर पर बैठाने के बावजूद पहले ही दिन इस बात पर लड़ाई छिड़वा दी कि राजा हरि सिंह ने अपनी रियासत भले भारत में मिला दी मगर मुस्लिम श्रीनगर और घाटी में क्योंकि बहुसंख्या में हैं इसलिए उसे भारत राष्ट्र-राज्य अपने में नहीं रख सकता।
मतलब पाकिस्तान की दुश्मनी जन्मजात है। उसका यह घोषित सिद्धांत है कि हिंदुओं पर हमने राज किया। लाल किला पर हमें झंडा फहराना है। हिंदुस्तान को निजाम ए मुस्तफा बनाना है भले इसके लिए हजार साल लड़ना पड़े। पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो हों या जिया उर रहमान या परवेज मुशर्रफ या हाफिज सईद और मसूद अजहर सबने घोषित तौर पर यदि भारत को बरबाद करने, तोड़ने की सार्वजनिक कसमें खाई हैं। आतंकी संगठनों और जिहादियों की मदरसों में फौज बनवाई है तो क्या भारत को यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे फिर इस दुश्मन से वैसे ही निपटना चाहिए जैसे इजराइल ने अपने दुश्मनों को निपटाया?
और भारत का ऐसा करना क्या भारत के मुसलमानों के लिए ठीक नहीं होगा? जम्मू-कश्मीर में यदि अलगावादी पत्थर फेंक कर भारत राष्ट्र-राज्य को झुकाने की फिराक में है तो उन्हें ठोकना, उनके प्रति सख्ती से पेश आना क्या भारत के मुसलमानों के हित में नहीं होगा? अब तो मुसलमानों के लिए यह इसलिए भी जरूरी है कि इस्लामी स्टेट, इराक, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक में भी जो हुआ है या जो हो रहा है वैसी स्थितियां यदि पाक या इस्लामी स्टेट का झंडा उठाए इस्लामी चरमपंथी कश्मीर घाटी में बनवा देना चाहते है तो क्या दिल्ली का मुसलमान या यूपी, केरल के मुसलमान के लिए खौफनाक नहीं होगा?
सो, भारत की नीति का मतलब यहां के हिंदू, मुसलमान दोनों के साझा दुश्मन के प्रति नीति है। आज मन ही मन सलमान खान, आमिर खान या शाहरुख खान भी सोचते होंगे कि पाकिस्तान, इस्लामी चरमपंथियों के बवाल ने कैसे उनका जीना हराम किया हुआ है। शाहरुख खान ने अमेरिका के एयरपोर्ट पर बेइज्जत होकर ‘माई नेम इज खान’ फिल्म बना कर दुनिया को बताना चाहा कि मैं तो सच्चा मुसलमान हूं, अमनपरस्त हूं मगर उसे फिर भी अमेरिकी एयरपोर्ट में बेखटके एंट्री नहीं मिली या भारत में विवादों में फंसा रहना होता है तो पाकिस्तान, हाफिज सईद, गिलानी, बगदादी जैसे दुश्मनों के ही कारण।
संदेह नहीं कि भारत का मुसलमान छाती फाड़ कर अपनी देशभक्ति दिखाने की चिंता में घुटा रहता है तो इसकी वजह क्या हिंदू हैं? क्या नरेंद्र मोदी या अमित शाह हैं या पहले मनमोहन सिंह या नेहरू, गांधी वजह थे?
नहीं, पूरी दुनिया में आज मुसलमान के लिए छाती फाड़ कर अपने को अमनपरस्त बताना अनिवार्य हुआ पड़ा है तो वजह इस्लाम के विचार से पैदा वे दुश्मन हैं जो ईसाई के भी दुश्मन हैं तो यहूदी और हिंदू के भी हैं और खुद मुसलमान के लिए भी हैं।
बहरहाल, मैं भटक रहा हूं, फलसफाई हो रहा हूं। पते की बात यह कि भारत को इजराइल जैसा बनाना मुसलमान के लिए खतरा नहीं है। भारत यदि पाकिस्तान को ठोकता है तो इसमें भारत के 15-20 करोड़ मुसलमानों को फिक्र नहीं करनी चाहिए। उसी में उनकी सुरक्षा है। हां, सचमुच पाकिस्तान और उसके आतंकियों की बरबादी भारत के मुसलमानों की खुशहाली है।
अपना मानना है कि पिछले 70 साल भारत राष्ट्र-राज्य सख्त नहीं था, इजराइल जैसी रीति-नीति से ताकत को सलामी की राष्ट्रनीति नहीं बनी तो उसी के कारण भारत का मुसलमान भी भटका रहा है। पाकिस्तान और उसके इस्लामी चरमपंथियों की कट्टरता ने भारत के मुसलमानों को गुमराह किया। कईयों ने पाकिस्तान को स्वर्ग, इस्लामी महाशक्ति का पर्याय बूझा। एक फेल, मवाली, गुंडे देश की गुमराही में जम्मू-कश्मीर के लोग भटके तो भारत में भी कई भटके।
इसलिए जनाब ए आली, भारत और उसका हिंदू यदि कौम की चिंता में, भारत माता, भारत भूमि की चिंता में अपने को इजराइल बनाने जैसा सोचता है तो उसमें भारत के मुसलमानों की खुशहाली भी है और सुरक्षा भी। आप अल्हा ताला से गुजारिश करें कि हिंदू सदियों के डर से बाहर निकल साहसी, निडर बने?
क्या करेंगे ऐसी इबादत?

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